विधायक अरविन्द पाण्डेय बनाम भाजपा! भाजपा के भीतर सियासी शतरंज, हर चाल के पीछे छुपा संदेश

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विधायक अरविन्द पाण्डेय बनाम भाजपा! भाजपा के भीतर सियासी शतरंज, हर चाल के पीछे छुपा संदेश!

विधायक अरविन्द पाण्डेय बनाम भाजपा!
भाजपा के भीतर सियासी शतरंज, हर चाल के पीछे छुपा संदेश!

बाजपुर/देहरादून, उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों जो हलचल दिखाई दे रही है, वह सामान्य नहीं है। घटनाओं का क्रम, उनकी टाइमिंग और उनके पीछे के किरदार—सब कुछ इस ओर इशारा कर रहा है कि गदरपुर विधायक अरविन्द पाण्डेय को लेकर भाजपा के भीतर एक सुनियोजित राजनीतिक शतरंज खेला जा रहा है।

पिछले तीन-चार दिनों में जिस तेजी से घटनाक्रम बदले हैं, उससे साफ है कि यह कोई आकस्मिक राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित घेराबंदी है—और हैरानी की बात यह कि इस घेराबंदी की धुरी विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी बनती नजर आ रही है।

बेबाक विधायक, असहज संगठन
पांच बार के विधायक अरविन्द पाण्डेय हमेशा से पार्टी के भीतर एक ऐसे चेहरे रहे हैं, जो सत्ता और संगठन—दोनों से टकराने का माद्दा रखते हैं। अवैध खनन से लेकर प्रशासनिक कार्यशैली तक, उन्होंने न केवल अफसरशाही को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि पार्टी से जुड़े प्रभावशाली चेहरों पर भी सार्वजनिक सवाल उठाए।

यही बेबाकी अब उनके लिए राजनीतिक असहजता का कारण बनती दिख रही है। पंचायत चुनाव हों या निकाय चुनाव—पाण्डेय लगातार “अपनों” से ही संघर्ष करते नजर आए। यह संघर्ष अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठनात्मक अंतर्विरोध का रूप ले चुका है।

वरिष्ठता अब ताकत नहीं, बोझ?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि पार्टी के भीतर बदलते समीकरणों में पाण्डेय की वरिष्ठता अब उन्हें बढ़त नहीं, बल्कि असुविधाजनक स्थिति में डाल रही है। अनुभव, जो कभी उनका सबसे बड़ा हथियार था, अब कई धड़ों को खटकने लगा है।

उनका आक्रामक और स्पष्टवादी रुख संगठन के उस वर्ग को असहज कर रहा है, जो “नियंत्रित राजनीति” में विश्वास रखता है।
प्रशासन से टकराव और राजनीतिक संदेश
जनपद की पुलिस और प्रशासन के साथ विधायक की खुली खींचतान अब किसी से छुपी नहीं है। पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग जाकर बयान देना, निर्णयों का सार्वजनिक विरोध करना—इन सबको भाजपा के भीतर अनुशासन के चश्मे से देखा जा रहा है।

हालांकि, हर मंच से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को “देश का सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री” बताना अब सिर्फ प्रशंसा नहीं माना जा रहा। राजनीतिक जानकार इसे आत्मरक्षा की रणनीति और संदेश आधारित राजनीति के रूप में देख रहे हैं—जहां हर वाक्य के पीछे दूसरा अर्थ छुपा है।

काशीपुर प्रकरण और CBI की मांग: सीमा रेखा के पार?
काशीपुर प्रकरण में सीधे CBI जांच की मांग ने संगठन के भीतर बेचैनी और बढ़ा दी है। पार्टी के कई नेता इसे आंतरिक मंचों के बजाय सार्वजनिक दबाव बनाने की कोशिश मान रहे हैं। यही कारण है कि पाण्डेय अब पार्टी के भीतर विवाद नहीं, विभाजन का केंद्र बनते दिख रहे हैं।

शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी—सबसे बड़ा संकेत
सबसे अहम सवाल यह है कि अब तक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई?
राजनीतिक गलियारों में यह चुप्पी दो तरह से देखी जा रही है—
एक वर्ग मानता है कि यह पाण्डेय के लिए सुरक्षा कवच है
दूसरा वर्ग इसे उनके खिलाफ बिछाई जा रही राजनीतिक बिसात की अंतिम तैयारी मान रहा है

निष्कर्ष
अरविन्द पाण्डेय फिलहाल केवल एक विधायक नहीं, बल्कि भाजपा की आंतरिक राजनीति का टेस्ट केस बन चुके हैं। सवाल यह नहीं है कि वे सही हैं या गलत—सवाल यह है कि क्या भाजपा अब असहज सवाल पूछने वालों के लिए जगह छोड़ती है या नहीं?

गदरपुर से देहरादून तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। अगली चाल कौन चलेगा और किसके मोहरे गिरेंगे—यह आने वाले दिन तय करेंगे।


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